Monday, 25 August 2014

                                         कुछ एहसास आँखों के नाम 

      

कभी  आइयने में तुम्हे निहारते हुए ,
तो कभी मन ही मन मुस्कुरा, तुम्हारी चमक बढ़ाते हुए.

कभी तुम्हे काजल से सजाते हुए ,
तो कभी गुस्से में उसे पोछते हुए .

कभी शरमाहट से पलके झुकाते हुए ,
तो कभी डर  से तुम्हे हाथों से छुपाते हुए .

कभी रात में तारों की चादर के तले उन्हें ताकते हुए,
तो कभी धुप में चश्मे से तुम्हे बचाते हुए.

कभी अनजान नज़रों से टकराते हुए,
तो कभी बुरी नज़रों को नज़रंदाज़ करते हुए.

कभी पानी  की छीटों से तुम्हारी थकान उतारते हुए,
तो कभी किसी जीत में ख़ुशी के आंसुओं को संभालते हुए.

कभी माधुरी की तरह नज़ाकत भरी अदाएं दर्शाते हुए,
तो कभी आत्मविश्वास के साथ अच्छी बुरी नजरो का सामना करते हुए.

है तो जज़्बात बताने को बेहिसाब ,
पर रहने दो उन्हें दिल के किसी कोने में एक अनछुए एहसास के साथ.  

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