आपसी विवाद नहीं ऐसी घटनाये
दील्ली में दरिंदगी कम थी,जो लखनऊ ने भी इसकी रफ़्तार पकड़ ली.आखिर लोगो
की मानसिकता है क्या.आखिर लोग चाहते क्या है की हम लडकियां अपनी ज़िन्दगी सुकून से
जिए या न जिए.स्वतंत्रता होने का मतलब सिर्फ अपने मन मुताबिक़ जीवन जीने तक सीमित
नहीं है बल्कि स्वंतंत्रता की परिभाषा वहां शुरू होती है जहाँ हमारा डर ख़तम होता
है.लेकिन फिर भी स्वतंत्र होने के बाद भी हम स्वतंत्र नहीं है.डर की बेड़ियों ने
हमे आज इस कदर जकड़ा हुआ है की हमारा हर कदम एक डर के साथ घर से बाहर निकलता है और
एक डर के साथ ख़तम होता है.क्यूँ हमारे माँ-बाप लड़की को जनम देने से डरते है.इसका
मतलब यह बिलकुल भी नहीं है की उन्हें हमारे लिए दहेज़ इक्कठा करने की चिंता है
बल्कि समाज में आय दिन लड़कियों के साथ हो रही दरिंदगी उनके हाँथ पाँव ठन्डे कर
देती है.कभी निर्भया,कभी मोहनलालगंज केस तो कभी गौरी.इन सभी घटनाओं ने जहाँ पुरे
देश और समाज को झन्झोर कर रख दिया.तो वही हम लड़कियों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया
की आखिर मैंने जन्म ही क्यूँ लिया.उसके ज़हेन में कई सवाल चलते होंगे की क्या मैंने
माँ की कोख से जन्म नहीं लिया,क्या मैं इंसान नहीं हूँ,क्यूँ जनम लेने के बाद भी
मुझे कोई आज़ादी नहीं है.सिर्फ इसलिए क्यूंकि मेरे साथ एक लड़की होने का टैग लगा
है?लड़की होने की इतनी बड़ी सजा है?जो आय दिन समाज में कोई भी राह चलते हम पर तेज़ाब
फेक कर हमारी पहचान चीन लेता है.तो कोई भी पेट में रॉड डाल कर हमारे साँसे चीन
लेता है.इन सबसे भी लोगो का मन नहीं भरा.तो जीते जी कसाइयों की तरह हमारे टुकड़े
कर हमे ऐसी प्रताड़ना दे दी है जिसने हमारे कुछ भी सोचने,समझने और करने की छमता को
ही ख़त्म कर देता है.क्या अब भी हमारी सरकार इन घटनाओं को “आपसी विवाद कहेगी”.पिछले
साल १७ जुलाई को मोहनलालगंज केस में कई दिनों तक कोर्ट में ट्रायल शुरू नहीं हो पाया .इन सब के बाद हमारी सरकार कहती है “बेटी बचाओ,बेटी पढाओ”.अरे जब ऐसी दरिंदगी से
बेटियाँ बचेंगी ही नहीं तो हम पढाएंगे किसे?सबसे पहले तो सरकार को कानून व्यवस्था
में बदलाव करने चाहिए क्यूंकि जब बेबस माँ-बाप अपनी लापता लड़की की रिपोर्ट दर्ज
कराने जाते है तो पुलिस प्रशासन उन्हें यह कह कर टरका देती है की वह अपनी मन मर्जी
से कही चली गयी है.यही नहीं अगर लड़की छोटे कपडे पहने होती है या लड़कों से बात करती
है तो भी लोग लड़की को ही गलत समझते है साथ ही साथ पुलिस प्रशाशन की ऊँगली भी सबसे
पहले लड़की पर ही उठती है और कई तरह के सवालों की छड़ी लग जाती है लेकिन ऐसे ही कुछ सवाल हम करे तो?की लडको को
लड़कियों का रपे करने का,उन पर तेज़ाब फेकने का,उनके टुकड़े करने का,उन्हें इतनी बेरहमी
से मारने का हक किसने दिया.हम लड़कियों के छोटे कपडे पहेने से और लडको से बात करने
पर कई सवाल खड़े हो जाते है जब की यह सब करने के लिए हम स्वतंत्र है.पर लडको को ऐसी
दरिंदगी करने के लिए तो कोई स्वतंत्रता नहीं है फिर क्यूँ आय दिन ऐसा होता आ रहा
है.क्या है कोई जवाब हमारी सरकार के पास?.....
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