Monday, 25 August 2014

                                         कुछ एहसास आँखों के नाम 

      

कभी  आइयने में तुम्हे निहारते हुए ,
तो कभी मन ही मन मुस्कुरा, तुम्हारी चमक बढ़ाते हुए.

कभी तुम्हे काजल से सजाते हुए ,
तो कभी गुस्से में उसे पोछते हुए .

कभी शरमाहट से पलके झुकाते हुए ,
तो कभी डर  से तुम्हे हाथों से छुपाते हुए .

कभी रात में तारों की चादर के तले उन्हें ताकते हुए,
तो कभी धुप में चश्मे से तुम्हे बचाते हुए.

कभी अनजान नज़रों से टकराते हुए,
तो कभी बुरी नज़रों को नज़रंदाज़ करते हुए.

कभी पानी  की छीटों से तुम्हारी थकान उतारते हुए,
तो कभी किसी जीत में ख़ुशी के आंसुओं को संभालते हुए.

कभी माधुरी की तरह नज़ाकत भरी अदाएं दर्शाते हुए,
तो कभी आत्मविश्वास के साथ अच्छी बुरी नजरो का सामना करते हुए.

है तो जज़्बात बताने को बेहिसाब ,
पर रहने दो उन्हें दिल के किसी कोने में एक अनछुए एहसास के साथ.  

Sunday, 24 August 2014

हैवानियत  ने फिर से दी दस्तक ,खोला नए निर्भया का चैप्टर 

दर्द ,पीड़ा ,चोट,तख़लीफ़ ये सारे शब्द सिर्फ शब्द  नहीं बल्कि किसी की ज़िन्दगी के  उस  भयानक दिन और मनहूस रात का  बखान करते है .जो  उस  वक़्त उस  लाचार  औरत  या फिर कहले  की एक  और  निर्भय के  दर्द  को चीख चीख कर पूरी दुनिया को दरिंदगी का  एक और भयानक पन्ना पढ़ने को  दे  रही थी .बेबस ,लाचर तो  वो  पहले  से  ही  थी  पति  न  होना उसकी  बाँहों  के  तले खुद  को  मेह्फूस  समझना ,उसके  साथ  को  एक  सुरख्षा  कवच  मानना  शायद  ज़्यादा  इन  तक  नहीं  रहा.पर क्या गलती थी  उसकी  की  वो अकेले  बिना  पति  के वो  अपने दो  बच्चों  की  अच्छे  से  देख  भाल  कर  रही  थी .या  फिर  वो एक औरत थी.सदियों  से  हमारे देश  में  और  प्रथाओं में  औरत  तो  मानो  एक  खिलौना  बन  कर  रह  गई.जिससे  जब  चाहे  लोग  खेल  ले  और  मन  भरने  पर  एक  कूड़ा  समझ  कर  गटर  में  फेक  देते  है .हमारे  यहाँ  तो  खिलौना  भी  कई  तरह  से  खेल  जाता  है .कभी  सती  तो कभी  द्रुपति इंसान  ने  हर  रूप  में  औरत  को  खेल  है  तो  अब निर्भया  के  रूप  में .निर्भया  जैसे भयानक  और  दर्दनाक  घटना  ने  पुरे  देश  को  जहाँ  एक ओर शर्म की अंधी में धूल से गन्दा होने के लिए मजबूर कर दिया था.तो वही उसकी चीखों हमें दर की आग में झुलसा कर रख दिया था.इस घटना ने पुरे देश को एक जुट हो कर इन्साफ की देहलीज़ पर कदम रख न्याय माँगा,नारे बाज़ी की,मोमबत्ती जल कर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की और इससे कही ज़्यादा पुलिस की लाठीयों का शिकार भी हुए.क्यों ?यह सवाल सबके मन में था क्यों उनकी आवाज़ों को लाठी के सहारे बंद किया जा रहा था .क्यों कोई कड़ा फैसला जल्दी  उन दरिंदों के खिलाफ नहीं लिया जा रहा था .लेकिन  लोगों की इस इन्साफ की लड़ाई ने न्याये करने पर आखिरकार मजबूर कर ही दिया और निर्भया को इन्साफ मिला.पर क्या ये इन्साफ काफी था?देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए देश की हालत  देखकर हम तो यही कहेंगे "नहीं" जहाँ निर्भया घटना के बाद प्रदेश में औरतो और लड़कियों पर होने वाले जुर्म कम हो जाने चाहिए तो वहीँ एक निर्भया को हम नही बचा पाये पर दूसरी तीसरी निर्भयाओं ने जन्म क्यों ले लिया? क्यों प्रदेश में ,राज्य में आज भी औरते और लड़कियां रात में क्या दिन में भी खुद को मेहफ़ूज़ नही समझती. उनका हर एक कदम घर के बाहर एक डर के साथ आगे बढ़ता है और एक डर के साथ ख़त्म होता है . कब तक महिलाएं इस डर के साथ जीती रहेंगी की दिल्ली की निर्भया के बाद वह प्रदेश की कहीं दूसरी चौथी निर्भया ना बन जाए. क्या है प्रशासन  के पास इसका कोई जवाब शायद "नही" और उनसे  हम उम्मीद  भी क्या कर सकते है भ्रष्टाचारर ने उनके मुह और हाँथ पैरों पर तले जो लगा  रखें  है. प्रशासन को शायद निर्भया की उन् चीखो में उमड़े दर्द का एहसास नही है जो उस वक्त उसने महसूस किया होगा, उन दरिंदों के भयानक चेहरे जो उस वक्त निर्भया को अपनी दरिंदगी से पीड़ा पहुंचा रहे थे. इन सबको इन सभी बातों का कोई एहसास नही है क्यूंकि आज तक इस तरह की घटना की शिकार उनकी माँ, बेटी और पत्नी नही हुई तभी शायद वह इस दर्द से परे है लेकिन सवाल यहाँ भी  खड़ा होता है की क्या ऐसी तमाम घटना जिसमे छोटी बच्चियां इनका शिकार बनती है क्या इन सब से भी इन्हे कोई फर्क नही पड़ता, क्या उनके मासूम  चेहरे भी नही दिखायी देते. नही दिखाई देते होंगे तभी आज ये हालत है की प्रदेश में निर्भया पर निर्भया जन्म लेती जा रहीं है और हम कुछ नही कर पा रहे. लगता है की ऐसी हैवानियत को अंजाम देने वाले दरिंदों को पुलिस प्रशासन और क़ानून को नही बल्कि जनता को सौंप देना चाहिए. जिससे उन दरिंदो को पता चले की महिला सिर्फ जुर्म सहने के लिए नही बल्कि उससे ख़त्म करने के लिए भी  पैदा हुई है. साथ ही साथ प्रशासन को भी एहसास हो की ऐसे दरिंदों को उम्र कैद या फ़ासी नही बल्कि ऐसी सजा होनी चाहिए  जिससे वह खुद मरने की भीक मांगे खुद भी वो तड़प , दर्द , घुटन महसूस करें जो उस वक्त उस निर्भया ने की होगी. ताकि ऐसे दुबारा करने से पहले दरिंदे सौ बार सोचने पर मजबूर हो जाये.

"औरत हूँ खिलौना नही 
बेबस हूँ पर कमज़ोर नही 
ऐ हैवानियत के दरिंदों अगर ले लूँ 
काली, दुर्गा का रूप तो तुम जैसे राक्षसों का नामों निशाँ नही "

Saturday, 23 August 2014

हर बैनर कुछ कहता है,
कभी छोटा तो कभी बड़ा होता है.

कभी मेंन रोड पर खड़ा मुस्कुराते हुए,
तो कभी रोड के किनारे धूल खाते हुए.

कभी सीधे साफ़ शब्दों में''दो बून्द ज़िन्दगी की'' कहता,
तो कभी एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा' की क्रिएटिविटी सिखाता.

कभी 1090 से सुरक्षित होने का एहसास कराता,
तो कभी''इनक्रेडिबल इंडिया''का खिताब दे जाता.

कभी ''दबंग से किक बनकर माउथ फ्रेश्नर'' बन जाता,
तो कभी''मोर देन टेबलेट एंड स्मार्टर देन फ़ोन एचपी'',स्मार्ट होने का एक और नया बहाना बन जाता.

कभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज का रास्ता सामने से दिखाता,
तो कभी ''व्हाई शुड बॉयज हैव ऑल द फन'' का मंत्र सिखाता.

नया बैनर आता है, तो पुराना चला जाता है,
पर अपने होने का मैसेज सबको दिखा जाता है.

तभी तो ''हर बैनर कुछ न कुछ कह'' जाता है.

Friday, 22 August 2014

                                                      दोस्ती में आया ब्रांड का नॉइज़                                                                                                                                                                                                                  
तुमसे दोस्ती करना तो बहुत पहले से चाहती थी.लेकिन पापा ने मन कर दिया.सालों इंतज़ार के बाद आखिर वो दिन आया.जब मेरी और तुम्हारी पहली मुलाकात हुई.देखते ही तुमको मन में पहला ख्याल आया की बस अब कुछ नहीं चाहिए.मेरा पहला दिन तो सिर्फ तुम्हारे बारे में जान्ने में लग गया.फिर कॉलेज का दूसरा दिन आया जब मैंने तुम्हारे साथ क्लास में एंटरी ली,तुम्हे मेरे साथ देख मेर्री सारी दोस्त तुम्हारे बारे में पूछने लगी और पुचा इसका नंबर क्या है.मिने भी फ्लौंट करते हुए नंबर दे दिया .तुम्हारे साथ बिताये हर दिन मुझे याद है.चाहे वो रात में फेसबुक पर चैटिंग करते हुए गाना सुनना हो,या फिर  बर्थडे होने पर 12 बजे का इंतज़ार करना हो.या तुम्हारे लिए कोई कलर चुनना हो.तुम्हारे किसी बात पर  साइलेंट हो जाने पर तुम्हे जनरल करना हो.या फिर तुम्हारे साथ सेल्फी का मज़ा हो.मेरे हमेशा गुस्सा होने पर मुझे एक क्यूट सी स्माइलीभेज कर मुझे मन्ना हो.पर न जाने कुछ दिनों से क्या हो गया है तुम्हे.कुछ बदल से गए हो ठीक से बाते भी नि होती है.कुछ नेटवर्क प्रॉब्लम तो कभी स्विच ऑफ जब भी जानने की कोशिश की तो 'नो रिप्लाई' मिला.मैंने सोचा हो सकता है को इंटरनल प्रॉब्लम हो.एक दिन मैंने देखा की सुबह तो तुम एक दम चार्ज थे,ये अचानक इतनी जल्दी लो कैसे हो गए.तब याद आया की कॉलेज आते वक़्त तुम गिर गए थे.तब मैंने पापा को बताया की तुम कुछ सही से वर्क नहीं कर रहे हो.मैं भी काफी दिन से नोटिस कर रही हूँ, की तुम्हारे चेहरे की स्क्रीन पर कुह अजीब सी लाइन बन गई है.साथ ही साथ तुम्हारा साउंड सिस्टम भी ख़राब चल रहा है.बात करने पर  कुछ कुछ साफ सुनाई नहीं देता और कॉल कट हो जाती है.लगता है शायद किस्मत को हमारा साथ नहीं भा रहा था.इतने दिनों से जो हमारे कम्युनिकेशन में नॉइज़ चल रहा थ.लेकिन नॉइज़ तब जादा हो गया जब उस दिन कॉलेज से लौटते वक़्त जब मेरे हाथ से तुम्हारा साथ छुट गया और तुम पूरी तरह से टूट गए.तुम्हारे चेहरे की स्क्रीन पर क्रेकक्स अ गए थे,और तुम्हारी पूरी बैटरी खतम हो चुकी थी.बेहोश हो कर तुम स्विच ऑफ गए .तुम्हारी इस हालत से घबराहट में दर के साथ मैं घर पोह्ची.पाप को सब बताया .पापा की शांति और मेरी तरह देखती उनकी ऑंखें उनका गुस्सा साफ़ ज़ाहिर कर रही थी.खैर उन्होंने अपना गुस्सा साइड और हम दोनों तुम्हे ठीक करवाने गए.काफी ज़द्दो ज़ेहेद के बाद भीं  तुम सही नहीं हुए.आखिर कार मुझे तुम्हे किसी और के साथ रेप्लास करना पड़ा.सोचा की तुम्हारी ही  केटेगरी का कोई दोस्त बनाउंगीलेकिन शायद किस्मत को ये मंज़ूर नहीं या फिर कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी की मेरी दोस्ती सैमसंग से से सीधे'' सोनी क्स्पेरिया '' से करा दी.अब जब ब्रांड सोनी का हो और फेअतुरेस में जब ''वात्सप्प और हाईक ''जैसे मैसेंजर का साथ हो तो हमारी दोस्ती में नॉइज़ का होना तो लाज़मी है यार.मुझे पता है मेरे दोस्त ''सैमसंग वेव २'' तुम यही सोच रहे होगे ''दोस्त दोस्त न रहा ,प्यार प्यार न रहा '' मगर जब मिले सैमसंग की जगह क्स्पेरिया का साथ तो क्यूँ न छूट जाए तुम्हारा हाथ.''
      

Thursday, 21 August 2014

     छक्के   छुड़ाने   आई   मेहेंगाई  , न   जाने  कब  जाएगी    भाई  

मेहेंगाई  एक  ऐसा  शब्द   है  जिसे  सुनते  ही  लोगो  के  मुह  से  पहला  शब्द  यही  निकलता  क्या  ऐसा  लगता  है  जैसे  किसी  सीरियल  में  कोई  नया  मोड़  आया  और  हम  देख  नही  पाये . मेहेंगाई  का  नाम  सुनते  ही  लोगों  का  ये  हाल  है  तो  सोचिये  की  जब  वाकई  में  मेहेंगाई  हर  चीज़  पर  सास  की  तरह  राज  करती  है  तो  बहुओं  को  कितनी  जलन  होती  और  परेशान  होती  वहीँ  जब  मेहेंगाई  जब  बॉस  की  तरह  आर्डर  देती  तो  वर्कर्स  का  क्या  हाल  होता .  जैसे  आये  दिन हम  टीवी  में  और  अखबारों  में  देखते  ही  रहते  है  की  डॉलर   के  मुकाबले  रूपए  और  नीचे  गिर  रहा  है  जिससे  सोने , चंडी , के  भाव  बढ़  गए  है , खाने  पीने  की  चीजों  के  दाम  बढ़  गए  है  अब  तो  लगता  है   की  कुछ   दिनों  में  खाने  पीने  की  चीजे  छोटी - छोटी  थैलियों   में  सुनारों  की  दुकानो  में  सोनेके  भाव  में  मिलेगी , क्यों  याद  है  आपको    थ्री    इडियट     का  ये  डायलाग    
भोजन    गारंटी  बिल  पास  होने  पर  नेता  फूले  नही  समाते , अरे  जब  ७५   रूपए  का  पेट्रोल   है , ५०  रूपए   किलो   प्याज   है  तो  ४५   रुपए    लीटर   दूध   है  तो  २   रूपए  का  गेहूं   लेकर   क्या  करेंगे  . अरे  भाई  माना   की  गरीबों   का  कोई  फायदा    होगा    पर  किसानो   का  सारा  अनाज  सीधा  सरकार  के  पास  जायेगा .
मेहेंगाई  से  हर  आदमी  बेहाल  है  गर्मी  के  कारण  तो  लोगों  का  पसीना  छूटता  ही  था   पर  अब  चीज़ों   के  दाम  देख कर   ही  पसीना  निकलना  शुरू  होगया  है सबकी  यह  हालत  देख  कर  पीपली  लाइव  का  यही  गाना  याद  आता  है  “ सखी  सैन्य  तो  खूब  ही  कमात  है , मेहेंगाई  डायन  खाए  जाट  है .”

Wednesday, 20 August 2014

                                   एकाउंटिंग एक्वेशंस या वैलेंटाइन वीक सिचुएशंस                                                          
 प्यार का टेस्ट सबको अच्छा लगता है,हर कोई इसे एक बार ज़रूर चखता है.फरवरी का महीना है ,प्यार की सर्द हवाएँ हर शाम को प्यार की शॉल ओढ़ कर आती है.बड़ी प्यार भरी होती है ये हवाएँ,जहाँ एक ओर प्यार की शॉल ओढ़े सर्दी से बचाती है तो वही मिटटी के गिलास में चाय की चुस्कियां प्यार में चीनी का काम करती है.प्यार का बुखार सबको होता है,पर फरवरी के मौसम में पता चलता है की थर्मामीटर में किसका प्यार का बुखार 102 डिग्री पर रहा ओर किस का 50 डिग्री पर ही सिमट कर रह गया.फरवरी में  जहाँ वैलेंटाइन का मौसम चलता है तो वही बोर्ड एग्जाम का दर सर पर तांडव कर रहा होता है.ऐसे में एकाउंट्स के स्टूडेंट को समझ  में नहीं आता की एकाउंटिंग इक्वेशन सॉल्व करूँ या फिर वैलेंटाइन की सिचुएशंस हैंडल करूँ.क्यूंकि एकाउंट्स में बैलेंस शीट बैलेंस करना ज़्यादा आसान है वैलेंटाइन वीक में अपने पार्टनर को बैलेंस करने से.7 फरवरी से वैलेंटाइन वीक शुरू हो जाता है वैसे तो प्यार करने वालों के लिए हर दिन वैलेंटाइन होता है पर इस वीक का मज़ा ही कुछ ओर है क्यूंकि इस वीक में लोग एकाउंट्स के लेगड़ेर  अकाउंट में डेबिट कम्स इन और क्रेडिट गोज़ आउट की तरह खुशियाँ इन कर लेते है और फ्रस्टेशन आउट कर देते है.वैलेंटाइन
वीक का पहला दिन होता है ''रोज डे'' होता है इस दिन हर कोई अपने वैलेंटाइन को रोज देता है.वैसे आज हम ''रोज डे''रोज देकर बनाते है ,अगर हम दिमाग की सुई रिवाइंड कर पुराने समय में जाए तो लोग इस ''रोज डे '' को कुछ इस अंदाज़ में पेश करते''फूल तुम्हे भेजा है खत में''.दूसरा दिन प्रोपोज़ डे होता है जिनकी प्यार की ट्रैन अभी तक नहीं चली होती है वो इस दिन अपने प्यार की टिकट कटवा कर ट्रैन के चलने का इंतज़ार करने लगता है और इस सिचुएशन उन्हें यही याद आता है ''दिल कहे क्या राज़ है जाने क्या कर गए आई लव यू''.तीसरा दिन ''चॉकलेट डे''का होता है,कोई चॉकलेट का पूरा पिटारा देता तो कोई फाइव स्टार से ही काम चला लेता.चौथा दिन होता है टेडी डे ज्यादा तर सबका फेवरेट होता कुछ होते है ,जो खुद को टेडी के रूप में गिफ्ट कर देते है तो कुछ होते है जो अपनी लाइफ की इक्वेशन सॉल्व करने बिजी होते है और टेडी थोड़ा से देर विश करते ,इस पर उनकी पार्टनर कहती है ''तू मेरा दिल तू मेरी जान ओ आई लव माय टेडी नोट यू'' समझे भुद्धू.वही पांचवां दिन प्रॉमिस डे का होता है और सब जानते है की प्रॉमिसेस तोड़ने के लिए ही बने होते है लेकिन इस दिन हर कोई दिल खोल कर प्रॉमिसेस करते है तो वही कुछ लोग अपनी 4 जीबी
मेमोरी को पुराने प्रॉमिसेस से फुल होती है,तो उसे फॉर्मेट मार के नए प्रॉमिसेस फिल करते है.फाइनली दो  दिन बाद वैलेंटाइन डे आता है जिसका हर किसी को बेसब्री से इंतज़ार रहता है.जहाँ स्वीट 16 वाला इश्क़ टीनएजर का 'पहला नशा पहला खुमार ले कर आता है'' तो वही हॉट 60s के कपल्स के लिए तो आज भी उनका ''दिल बचा है जी तो''तभी तो हॉट 60s के मेल अपनी वैलेंटाइन से कहते है की''ऐ मेरी जौहर ज़बी तुझे मालूम नहीं तू अभी तक है हसीं और मैं जवान ''तो वही उनकी हॉट 60s की वैलेंटाइन उन्हें रिप्लाई में कहती है मैं क्या करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया.ये सब देखर लगता है की कुछ की लवशीट इज़ली बैलेंस हो जाती है तो कुछ को अभी भी अपने रिश्ते को बैलेंस करने के लिए अपने लव की इक्वेशन को ब्लंके करना पड़ता है..

Tuesday, 19 August 2014

लिखना चाहता था कुछ कलम ,
तो उसने बढ़ाये दोस्ती की तरफ कदम.

बढ़ते कदमो के साथ,  
उसने लिखा दोस्ती का नाम . 

और दिया उसने ये पैगाम,. 
सरे रिश्तों में  है खास दोस्ती का साथ. 

Monday, 18 August 2014

                                                               कुछ जज्बात तुम्हारे नाम

मिली थी तुमसे जब पहली बार,हुआ था कुछ अलग एहसास,
सोचा क्या इसी को कहते है प्यार,फिर सोचा इतनी जल्दी थोड़ी ना होता है प्यार.

फिर मिली तुमसे कुछ महीने बाद,
दिल ने पूछा क्या आज भी याद हूँ तुम्हे मैं इतने महीनो बाद.

सुनना चाहती थी कोई ख़ास जवाब,
पर तुम ना समझे मेरे दिल की बात.

उदास हुए दिल को समझाया,
नहीं मिलेगा इतनी जल्दी दिल का जवाब.

सामने खड़े तुम्हारी आँखों से झलक रहा था मेरे लिए प्यार,
पर ना जाने क्यों छुपा रहे थे तुम अपने दिल का हाल.

सोचा पहेली नज़र का पहला है प्यार ,
इतना तो दर बनता है यार.

कदम से कदम मिला कर हम चल रहे थे साथ,
हवाएँ भी दे रही थी हमारा साथ.

शायद इन्हे भी पता था हमारे दिल का हाल,
पर ना जाने तुम क्यों चुप the आज.

दिल भर रहा था उमीदों की उड़ान,
की बताओगे तुम मुझे अपने दिल के जज्बात.

थोड़ी देर बात तुमने पकड़ा मेरा हाथ,
मानो हुआ कुछ खूबसूरत एहसास.

ख़ुशी में घबराहट के साथ मैंने पूछा,
क्या कुछ कहना चाहते हो आज.

तुमने कहा हाँ कहनी है तुमसे कोई ज़रूरी बात,
दिल को पता था करोगे आज तुम अपने दिल का इज़हार.

बढ़ती बेचैनी,तेज़ धड़कता दिल सुनना चाहता था,
तुमसे प्यार के वो तीन सुनहरे शब्द.

जब बोला तुमने ना बांधो मुझसे उमींदो की गाँठ,
नहीं करता मैं तुमसे प्यार.

तुम भी भूल जाओ ये एहसास,ये प्यार,
मजबूर हूँ किसी और का होने को आज.

तुम्हारे इन तीखे शब्दों ने अंदर से तोड़ कर रख दिया था मुझे आज,
पर खुद को सँभालते हुए मैंने मुस्कुरा कर कहा ''ये कुछ जज्बात है मेरे जो सिर्फ है तुम्हारे नाम''.

तो कैसे भूल जाऊं इस प्यार,इस एह्साह को,
जिसमे बस्ती है मेरी ''जान''..  

Sunday, 17 August 2014


                                               


                                       पुराने लखनऊ की नवाबी शान या नए लखनऊ का यंगिस्तान

 जहाँ पुराने लखनऊ की शान है 'घंटाघर और इमामबाड़ा '
तो वहीँ नए यंगिस्तान के 'माल्स और आंबेडकर पार्क है निराला'

जहाँ पुराने लखनऊ की खासियत है 'टुंडे कबाब'
तो वहीँ नए यंगिस्तान का फेमस है 'चिकन लोलीपोप्स'

जहाँ पुराने लखनऊ की मिठास है 'घेवर और सेवई'
तो वहीँ नए यौंगिस्तान का 'चॉकलेट्स ब्राऊनी है सुगरी लिप्स'

जहाँ पुराने लखनऊ को पसंद है 'चिकन कारीगरी'
तो वहीँ नए यंगिस्तान को भाया 'वन पीस और केप्रिस'

जहाँ पुरानी लखनऊ को प्रिये है'मधुबाला और मीनाकुमारी'
तो वहीँ नए यंगिस्तान को भाति है 'करीना और सनी लेओनी'

कहते है 'ओल्ड इस गोल्ड 'पर अब साथ ही 'नई इस बोल्ड' 



Saturday, 16 August 2014

badla, badlav ka dhang

बदलाव हर किसी के जीवन में कभी न कभी या कही न कही होता है चाहे ये बदलाव हमारे देश में नेताओ की छवि लेकर  सोच में हो ,या फिर लोगो की व  सुरक्षा केलिए कानून व्यवस्था में हो. हर वयक्ति के लिए बदलाव की एक अलग परिभाषा है.मेरे लिए भी हर बदलाव कुछ कहता है. कहने को तो समाज में हर किस्म के बदलाव देखने को है लेकिन मेरे मुताबिक आज भी लोगो की सामाजिक सोच महिलाओ के लिए नहीं बदली है।  महिलाओ को कही न कही एक लोभ और आकर्षण का रूप  मानते है. मन समाज में महिलाओ की सुरक्षा को लेकर कई योजनाये है फिर भी क्या इन सबसे कोई बदलाव आया है। महिलाओ के प्रति लोगो में यह सवाल  में खटकता है की किस तरह के बदलाव से  नजरिया बदलेगा। वो दर्द,तकलीफ और घुटन उन्हें कब महसूस होगी आज समाज में कई निर्भयाओं ने महसूस है। जरा सोचिये अगर आज समाज इ महिलो का दर्जा पुरषो को  जाये तो ,सोचिये उन्ही भी घर से निकलते समय यह डर होगा की रह चलते उन्हें भी कोई छेद न दे,कही कोई उनका भी रेप  करदे। उसके बाद टीवी पर अगर सहानभूति की बजाये अगर नेता जी उन्हें दरिंदो को भाई कैसे बनाये उसकी सलाह देने लगे तो ,उनके कपडे पहनने  के ढंग पर अपनी वाहियात टिप्पणी करने लगे तो.फिर  इन सबसे पुरुश वर्ग को पता चलेगा की शर्मिंदगी क्या होती है ,पीड़ा ,घुटन किस बेबसी का नाम है।
                        आज के समाज में लोग फिल्मो में अभिनेत्रियों के बिकनी सीन्स पर थोक के भाव सिटी और तालियों के बौछार करने लगते है।  अगर पुरुष  कोई वयक्ति बिकनी पहन कर फिल्मो में काम करने लगे तो ,क्या उन्हें भी इतनी ही सीटिया और तालिया मिलेंगी?शायद नहीं तब लोगो का कहना होगा की यह कला की बेज्जती है लेकिन जब अभिनेत्री ऐसा कुछ  तो लोगो के लिए वह एक कला नहीं बल्कि एक आइटम के रूप में नजर आती है, लोगो के मोबाइल का वॉलपेपर बन जाती है.
  कहने को तो बदलाव  है पर अपनाये कितने गए है। सिर्फ बदलाव कह देने से बदलाव नहीं आता जब तक इंसान उस बदलाव को महसूस  लेता तब तक बदलाव मुश्किल है। महिलाओ के चरित्र   आसान है उसके चरित्र के साथ खेलना  है.लेकिन  उसी उंगली को पकड़ कर  बनाना कठिन है। सिर्फ प्रदर्शन और नारे बजी  सहारा  नहीं हैज़ब तक महिलाओ के चरित्र पर उठी उन्गक्ली पुरुष वर्ग  पर  नाग=ही लगेगी ,तब तक समाज बदलाव के नाम पर नेता जी  के भाषण और रैली ही दिखाई देंगी। लेकिन जिस दिन बदलाव की आंधी पुरुष वर्ग से होकर चलेगी उस दिन नजारा कुछ  और ही   होगा।