हैवानियत ने फिर से दी दस्तक ,खोला नए निर्भया का चैप्टर
दर्द ,पीड़ा ,चोट,तख़लीफ़ ये सारे शब्द सिर्फ शब्द नहीं बल्कि किसी की ज़िन्दगी के उस भयानक दिन और मनहूस रात का बखान करते है .जो उस वक़्त उस लाचार औरत या फिर कहले की एक और निर्भय के दर्द को चीख चीख कर पूरी दुनिया को दरिंदगी का एक और भयानक पन्ना पढ़ने को दे रही थी .बेबस ,लाचर तो वो पहले से ही थी पति न होना उसकी बाँहों के तले खुद को मेह्फूस समझना ,उसके साथ को एक सुरख्षा कवच मानना शायद ज़्यादा इन तक नहीं रहा.पर क्या गलती थी उसकी की वो अकेले बिना पति के वो अपने दो बच्चों की अच्छे से देख भाल कर रही थी .या फिर वो एक औरत थी.सदियों से हमारे देश में और प्रथाओं में औरत तो मानो एक खिलौना बन कर रह गई.जिससे जब चाहे लोग खेल ले और मन भरने पर एक कूड़ा समझ कर गटर में फेक देते है .हमारे यहाँ तो खिलौना भी कई तरह से खेल जाता है .कभी सती तो कभी द्रुपति इंसान ने हर रूप में औरत को खेल है तो अब निर्भया के रूप में .निर्भया जैसे भयानक और दर्दनाक घटना ने पुरे देश को जहाँ एक ओर शर्म की अंधी में धूल से गन्दा होने के लिए मजबूर कर दिया था.तो वही उसकी चीखों हमें दर की आग में झुलसा कर रख दिया था.इस घटना ने पुरे देश को एक जुट हो कर इन्साफ की देहलीज़ पर कदम रख न्याय माँगा,नारे बाज़ी की,मोमबत्ती जल कर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की और इससे कही ज़्यादा पुलिस की लाठीयों का शिकार भी हुए.क्यों ?यह सवाल सबके मन में था क्यों उनकी आवाज़ों को लाठी के सहारे बंद किया जा रहा था .क्यों कोई कड़ा फैसला जल्दी उन दरिंदों के खिलाफ नहीं लिया जा रहा था .लेकिन लोगों की इस इन्साफ की लड़ाई ने न्याये करने पर आखिरकार मजबूर कर ही दिया और निर्भया को इन्साफ मिला.पर क्या ये इन्साफ काफी था?देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए देश की हालत देखकर हम तो यही कहेंगे "नहीं" जहाँ निर्भया घटना के बाद प्रदेश में औरतो और लड़कियों पर होने वाले जुर्म कम हो जाने चाहिए तो वहीँ एक निर्भया को हम नही बचा पाये पर दूसरी तीसरी निर्भयाओं ने जन्म क्यों ले लिया? क्यों प्रदेश में ,राज्य में आज भी औरते और लड़कियां रात में क्या दिन में भी खुद को मेहफ़ूज़ नही समझती. उनका हर एक कदम घर के बाहर एक डर के साथ आगे बढ़ता है और एक डर के साथ ख़त्म होता है . कब तक महिलाएं इस डर के साथ जीती रहेंगी की दिल्ली की निर्भया के बाद वह प्रदेश की कहीं दूसरी चौथी निर्भया ना बन जाए. क्या है प्रशासन के पास इसका कोई जवाब शायद "नही" और उनसे हम उम्मीद भी क्या कर सकते है भ्रष्टाचारर ने उनके मुह और हाँथ पैरों पर तले जो लगा रखें है. प्रशासन को शायद निर्भया की उन् चीखो में उमड़े दर्द का एहसास नही है जो उस वक्त उसने महसूस किया होगा, उन दरिंदों के भयानक चेहरे जो उस वक्त निर्भया को अपनी दरिंदगी से पीड़ा पहुंचा रहे थे. इन सबको इन सभी बातों का कोई एहसास नही है क्यूंकि आज तक इस तरह की घटना की शिकार उनकी माँ, बेटी और पत्नी नही हुई तभी शायद वह इस दर्द से परे है लेकिन सवाल यहाँ भी खड़ा होता है की क्या ऐसी तमाम घटना जिसमे छोटी बच्चियां इनका शिकार बनती है क्या इन सब से भी इन्हे कोई फर्क नही पड़ता, क्या उनके मासूम चेहरे भी नही दिखायी देते. नही दिखाई देते होंगे तभी आज ये हालत है की प्रदेश में निर्भया पर निर्भया जन्म लेती जा रहीं है और हम कुछ नही कर पा रहे. लगता है की ऐसी हैवानियत को अंजाम देने वाले दरिंदों को पुलिस प्रशासन और क़ानून को नही बल्कि जनता को सौंप देना चाहिए. जिससे उन दरिंदो को पता चले की महिला सिर्फ जुर्म सहने के लिए नही बल्कि उससे ख़त्म करने के लिए भी पैदा हुई है. साथ ही साथ प्रशासन को भी एहसास हो की ऐसे दरिंदों को उम्र कैद या फ़ासी नही बल्कि ऐसी सजा होनी चाहिए जिससे वह खुद मरने की भीक मांगे खुद भी वो तड़प , दर्द , घुटन महसूस करें जो उस वक्त उस निर्भया ने की होगी. ताकि ऐसे दुबारा करने से पहले दरिंदे सौ बार सोचने पर मजबूर हो जाये.
"औरत हूँ खिलौना नही
बेबस हूँ पर कमज़ोर नही
ऐ हैवानियत के दरिंदों अगर ले लूँ
काली, दुर्गा का रूप तो तुम जैसे राक्षसों का नामों निशाँ नही "
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