Monday, 18 August 2014

                                                               कुछ जज्बात तुम्हारे नाम

मिली थी तुमसे जब पहली बार,हुआ था कुछ अलग एहसास,
सोचा क्या इसी को कहते है प्यार,फिर सोचा इतनी जल्दी थोड़ी ना होता है प्यार.

फिर मिली तुमसे कुछ महीने बाद,
दिल ने पूछा क्या आज भी याद हूँ तुम्हे मैं इतने महीनो बाद.

सुनना चाहती थी कोई ख़ास जवाब,
पर तुम ना समझे मेरे दिल की बात.

उदास हुए दिल को समझाया,
नहीं मिलेगा इतनी जल्दी दिल का जवाब.

सामने खड़े तुम्हारी आँखों से झलक रहा था मेरे लिए प्यार,
पर ना जाने क्यों छुपा रहे थे तुम अपने दिल का हाल.

सोचा पहेली नज़र का पहला है प्यार ,
इतना तो दर बनता है यार.

कदम से कदम मिला कर हम चल रहे थे साथ,
हवाएँ भी दे रही थी हमारा साथ.

शायद इन्हे भी पता था हमारे दिल का हाल,
पर ना जाने तुम क्यों चुप the आज.

दिल भर रहा था उमीदों की उड़ान,
की बताओगे तुम मुझे अपने दिल के जज्बात.

थोड़ी देर बात तुमने पकड़ा मेरा हाथ,
मानो हुआ कुछ खूबसूरत एहसास.

ख़ुशी में घबराहट के साथ मैंने पूछा,
क्या कुछ कहना चाहते हो आज.

तुमने कहा हाँ कहनी है तुमसे कोई ज़रूरी बात,
दिल को पता था करोगे आज तुम अपने दिल का इज़हार.

बढ़ती बेचैनी,तेज़ धड़कता दिल सुनना चाहता था,
तुमसे प्यार के वो तीन सुनहरे शब्द.

जब बोला तुमने ना बांधो मुझसे उमींदो की गाँठ,
नहीं करता मैं तुमसे प्यार.

तुम भी भूल जाओ ये एहसास,ये प्यार,
मजबूर हूँ किसी और का होने को आज.

तुम्हारे इन तीखे शब्दों ने अंदर से तोड़ कर रख दिया था मुझे आज,
पर खुद को सँभालते हुए मैंने मुस्कुरा कर कहा ''ये कुछ जज्बात है मेरे जो सिर्फ है तुम्हारे नाम''.

तो कैसे भूल जाऊं इस प्यार,इस एह्साह को,
जिसमे बस्ती है मेरी ''जान''..  

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