बदलाव हर किसी के जीवन में कभी न कभी या कही न कही होता है चाहे ये बदलाव हमारे देश में नेताओ की छवि लेकर सोच में हो ,या फिर लोगो की व सुरक्षा केलिए कानून व्यवस्था में हो. हर वयक्ति के लिए बदलाव की एक अलग परिभाषा है.मेरे लिए भी हर बदलाव कुछ कहता है. कहने को तो समाज में हर किस्म के बदलाव देखने को है लेकिन मेरे मुताबिक आज भी लोगो की सामाजिक सोच महिलाओ के लिए नहीं बदली है। महिलाओ को कही न कही एक लोभ और आकर्षण का रूप मानते है. मन समाज में महिलाओ की सुरक्षा को लेकर कई योजनाये है फिर भी क्या इन सबसे कोई बदलाव आया है। महिलाओ के प्रति लोगो में यह सवाल में खटकता है की किस तरह के बदलाव से नजरिया बदलेगा। वो दर्द,तकलीफ और घुटन उन्हें कब महसूस होगी आज समाज में कई निर्भयाओं ने महसूस है। जरा सोचिये अगर आज समाज इ महिलो का दर्जा पुरषो को जाये तो ,सोचिये उन्ही भी घर से निकलते समय यह डर होगा की रह चलते उन्हें भी कोई छेद न दे,कही कोई उनका भी रेप करदे। उसके बाद टीवी पर अगर सहानभूति की बजाये अगर नेता जी उन्हें दरिंदो को भाई कैसे बनाये उसकी सलाह देने लगे तो ,उनके कपडे पहनने के ढंग पर अपनी वाहियात टिप्पणी करने लगे तो.फिर इन सबसे पुरुश वर्ग को पता चलेगा की शर्मिंदगी क्या होती है ,पीड़ा ,घुटन किस बेबसी का नाम है।
आज के समाज में लोग फिल्मो में अभिनेत्रियों के बिकनी सीन्स पर थोक के भाव सिटी और तालियों के बौछार करने लगते है। अगर पुरुष कोई वयक्ति बिकनी पहन कर फिल्मो में काम करने लगे तो ,क्या उन्हें भी इतनी ही सीटिया और तालिया मिलेंगी?शायद नहीं तब लोगो का कहना होगा की यह कला की बेज्जती है लेकिन जब अभिनेत्री ऐसा कुछ तो लोगो के लिए वह एक कला नहीं बल्कि एक आइटम के रूप में नजर आती है, लोगो के मोबाइल का वॉलपेपर बन जाती है.
कहने को तो बदलाव है पर अपनाये कितने गए है। सिर्फ बदलाव कह देने से बदलाव नहीं आता जब तक इंसान उस बदलाव को महसूस लेता तब तक बदलाव मुश्किल है। महिलाओ के चरित्र आसान है उसके चरित्र के साथ खेलना है.लेकिन उसी उंगली को पकड़ कर बनाना कठिन है। सिर्फ प्रदर्शन और नारे बजी सहारा नहीं हैज़ब तक महिलाओ के चरित्र पर उठी उन्गक्ली पुरुष वर्ग पर नाग=ही लगेगी ,तब तक समाज बदलाव के नाम पर नेता जी के भाषण और रैली ही दिखाई देंगी। लेकिन जिस दिन बदलाव की आंधी पुरुष वर्ग से होकर चलेगी उस दिन नजारा कुछ और ही होगा।
आज के समाज में लोग फिल्मो में अभिनेत्रियों के बिकनी सीन्स पर थोक के भाव सिटी और तालियों के बौछार करने लगते है। अगर पुरुष कोई वयक्ति बिकनी पहन कर फिल्मो में काम करने लगे तो ,क्या उन्हें भी इतनी ही सीटिया और तालिया मिलेंगी?शायद नहीं तब लोगो का कहना होगा की यह कला की बेज्जती है लेकिन जब अभिनेत्री ऐसा कुछ तो लोगो के लिए वह एक कला नहीं बल्कि एक आइटम के रूप में नजर आती है, लोगो के मोबाइल का वॉलपेपर बन जाती है.
कहने को तो बदलाव है पर अपनाये कितने गए है। सिर्फ बदलाव कह देने से बदलाव नहीं आता जब तक इंसान उस बदलाव को महसूस लेता तब तक बदलाव मुश्किल है। महिलाओ के चरित्र आसान है उसके चरित्र के साथ खेलना है.लेकिन उसी उंगली को पकड़ कर बनाना कठिन है। सिर्फ प्रदर्शन और नारे बजी सहारा नहीं हैज़ब तक महिलाओ के चरित्र पर उठी उन्गक्ली पुरुष वर्ग पर नाग=ही लगेगी ,तब तक समाज बदलाव के नाम पर नेता जी के भाषण और रैली ही दिखाई देंगी। लेकिन जिस दिन बदलाव की आंधी पुरुष वर्ग से होकर चलेगी उस दिन नजारा कुछ और ही होगा।
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