Tuesday, 25 April 2017

नज़रिया

नज़रिया 


हालही में रिलीज़ हुई मूवी "बेग़म जान" देखी और हर महिला उन्मुख मूवी की तरह इस मूवी को देखकर भी नारी सशक्तिकरण वाली भावना जाग उठी। कुछ द्रश्यों  में तो रौंगटे भी खड़े हो गए।  लेकिन इस मूवी का असर सिर्फ तीन घण्टे तक ही नहीं रहा , बल्कि हमारी "बेग़म जान" ने हमे समाज के कई पहलुओं पर  खास कर वेश्याओं के लिए सोचने पर मजबूर ही नहीं, कुछ लिखने के लिए, कुछ अच्छा सोचने के लिए प्रेरित भी किया। 
          अब आप सोच रहे होंगे की वेश्याओं के लिए क्या अच्छा हो सकता है।  शायद इस बात को सुनकर कुछ लोग तो "HAWW (हॉव )" कर रहे होंगे , क्यूंकि " HAWW 😮और AWW😊 " आजकल ट्रेंड में जो है।  तो मैं उन सभी ट्रेंड फॉलोवर्स को कहना चाहती हूँ , कि एक बार पधारिये हमारे "बावरों की पाठशाला" में सारा "HAWW 😮😮  और AWW 😊 😊 " निकल जायेगा।  सच मनो तो आज बहुत अच्छा लग रहा है इस पाठशाला का हिस्सा बनकर। तभी तो "बेग़म जान ", आज "जान " सी लग रही है। पाठशाला में लेक्चर्स के दौरान कुछ बातें तभी से मन में घर कर गयी, कि वेश्या , कुलटा , तवायफ इन सब को देखकर हम लोग ऐसे मुँह बनाते है जैसे सड़क पर पड़े कोड़े को देखकर।  लेकिन शायद हम ये भूल जाते है कि यही कूड़ा लोगो की रात को और हसीन बनाने वाला लायक सामान बन जाता है। वैसे भी किसी ने सही कहा है , कि वेश्याओं के लिए क्या दिन और क्या रात दोनों एक जैसे होते है, "बस बत्ती बुझने की देरी होती है।"
                                   मूवी के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे मंदबुधियों से हुई की मन किया , तुम लोग जिन्हे देखकर सिटी मार रहे हो, कमेंट पास कर रहे हो , वो तुम मूर्खों से कही ज़्यादा दबंग , बोल्ड और निडर है। अगर मेरे बस में होता तो तुम लोगो के हाँथ और मुँह का वो क्या कहते है "PARTITION" करवा  देंगे।  लेकिन फिर सोचा कि कुछ लोगो के लिए मूवी सिर्फ एक " एंटरटेनमेंट  " ही है। शायद लोगो ने विद्या बालन जी का "डर्टी पिक्चर"का ये डायलॉग "फिल्मे सिर्फ ३ चीज़ो से चलती है एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट एंड  एंटरटेनमेंट" को काफी संजीदगी से ले लिया है। तभी तो उन्हें "बेग़म जान" में सिर्फ "हवस के पुजारी" ही नज़र आये।  लेकिन मूवी में गुलाबो ,रुबीना ,शबनम ,लाडली का क्या किरदार था ,वो उनकी बेफिज़ूल सीटियों , तालियों और भद्दे कमैंट्स से समझ आ रहा था।  
                                 शायद इन्हे गुलाबो का मास्टरजी के लिए वो प्रेम नज़र नहीं आया जो वो अपने धंदे को अलग रखकर उनके लिए हर गुरुवार व्रत रखती और उन्हें देखकर अपना व्रत तोड़ती , शायद इन्हे शबनम का वो दर्द वो ख़ामोशी महसूस नहीं हुई , जो सन्नाटे को मात दे रही थी, यहाँ तक की इन्हे तो लाडली की वो हिम्मत वो हौसला भी नज़र नहीं आया, जब अपनी माँ और अपने आप को बचाने के लिए खुद निर्वस्त्र होकर सामने वाले को शर्मसार कर दिया। 
                                 इन सबके पीछे का दर्द , इनकी सहनशीलता और भावनाये क्या है , हम नहीं समझ सकते।  इतनी गालियां, आलोचनाएं सुनने के बाद और अपनी इच्छाओं को मारकर , अपने काम को इतनी ईमानदारी के साथ करना कोई इनसे सीखे।  सालो की मेहनत के बाद ये कलाकर हमे ३ घण्टे में समाज के अलग अलग पहलुओं से रूबरू कराते है। चाहे पुराने ज़माने में होने वाली " जौहर प्रथा " हो या फिर हर महीने हमे लाल करके जाती  "मासिक अवधि।" इन दोनों बातों से और ऐसी तमाम बातों से महिलाओं में सहनशीलता, धैर्य, ताकत और ईमानदारी साफ़ झलकती है।  लेकिन आज भी महिलायें समाज और इसकी रूढ़िवादी बातों के बीच पिस रही है। शायद आगे भी पिसती आएंगी। इसीलिए कहा गया है। 

चलती चाखि देख कर 
दिया कबीरा रोये , 
दो पाटन के बीच में, सबूत बचा न कोई.....  












Monday, 6 July 2015

                                                      वृक्षारोपण या नाट्य रूपांतर


जन्मदिन पर  ही क्यों आया तुम्हे ये याद,
करेंगे दिन की शुरुआत व्रक्षरोपण  के साथ|

जब बनना ही था वृक्षों का रक्षक ,
तो फिर क्यों बन गए उनके ही भक्षक |

साईकल पथ बनवाने से क्या होगी उन्नति ,
जब मन में लगी हो हीन भावना व रुदिवादी की छड़ी |

अगर करनी है देश की उन्नति ,
तो पहले करो वातावरण की शुद्धी |

सिर्फ एक दिन क्यों हो व्रक्षरोपण की शुरुआत ,
अगर लाना है वातावरण और स्वास्थ में उन्नति,
तो करना होगा हर दिन वृक्षारोपण से आगाज़ |

Saturday, 21 February 2015

बस शिकायत है मुझे

जहाँ बूढ़े माँ-बाप को औलाद से शिकायत है,जनता को सरकार से शिकायत है,सेंसर बोर्ड को फिल्मो में अश्लीलता से शिकायत है,गर्लफ्रेंड को बॉयफ्रेंड से शिकायत है,प्रक्रति को मनुष्य से शिकायत है| तो वहीँ एक मैं भी हूँ जिसे दूसरों से नहीं खुद से शिकायत है| शायद जो करना चाहती हूँ,वो कर नहीं पाती हूँ,जो समझाना चाहती हूँ,वो समझा नहीं पाती हूँ| सब जानते हुए भी चुप रह जाती हूँ| काश जो हुआ था वो बता देती तो आज खुद से शिकायत न होती| लेकिन क्या बताती माँ-पापा को कि कैसे उन गंदे हांथों ने आपकी छोटी सी बेटी को बड़ा बना दिया|कैसे उसकी गंदी और डरावनी नज़रों ने मुझे सहमा दिया| कैसे उसकी अश्लील बातों ने मुझे खुद से ही घिन करवा दी| कैसे बताती कि जिसने मुझे खिलने से पहेले ही मुरझाने पर मजबूर कर दिया,वो कोई अपना ही है|दर था कि कहीं ये बताने पर माँ-पापा ने मुझे ही गलत समझा तो|यही सोचते-सहमते बचपन बीत गया|बड़ी तो पहले ही हो चुकी थी बस फर्क इतना था,कि पहले लोगो को दीखता नहीं था पर अब दिखने लगा है| बड़े होने के साथ-साथ मेरी शिकायत बढती गयी| मुझे पता है कि मेरे अधिकार क्या है, मैं स्वतंत्र हूँ कुछ भी कहने के लिए,गलत होने से रोकने के लिए,पर ये सब जानते हुए भी आज तक कुछ नहीं बोल पाई| सब जानते हुए भी चुप रही इससे शिकायत है मुझे| अपनी नज़रों के सामने उस इंसान को हँसते और कुछ न कर पाने से शिकायत है मुझे| डरपोक और कमजोर होने से शिकायत है मुझे| गुस्सा होने के बावजूद उसे ज़ाहिर न कर पाने से शिकायत है मुझे|मेरे दर और चुप्पी के कारण ये किसी और कि शिकायत न बन जाये,इससेभी शिकायत है मुझे| थक गयी हूँ इन शिकायतों से अपने ही दर और सोच से, “ खत्म करना चाहती हूँ इस डर को, तोड़ना चाहती हूँ इस चुप्पी को, इंतज़ार है बस मुझे उस लम्हे का दूंगी जब मूंहतोड़ जवाब उस दरिन्दे को”.

Monday, 16 February 2015

आपसी विवाद नहीं ऐसी घटनाये

                            आपसी विवाद नहीं ऐसी घटनाये 


दील्ली में दरिंदगी कम थी,जो लखनऊ ने भी इसकी रफ़्तार पकड़ ली.आखिर लोगो की मानसिकता है क्या.आखिर लोग चाहते क्या है की हम लडकियां अपनी ज़िन्दगी सुकून से जिए या न जिए.स्वतंत्रता होने का मतलब सिर्फ अपने मन मुताबिक़ जीवन जीने तक सीमित नहीं है बल्कि स्वंतंत्रता की परिभाषा वहां शुरू होती है जहाँ हमारा डर ख़तम होता है.लेकिन फिर भी स्वतंत्र होने के बाद भी हम स्वतंत्र नहीं है.डर की बेड़ियों ने हमे आज इस कदर जकड़ा हुआ है की हमारा हर कदम एक डर के साथ घर से बाहर निकलता है और एक डर के साथ ख़तम होता है.क्यूँ हमारे माँ-बाप लड़की को जनम देने से डरते है.इसका मतलब यह बिलकुल भी नहीं है की उन्हें हमारे लिए दहेज़ इक्कठा करने की चिंता है बल्कि समाज में आय दिन लड़कियों के साथ हो रही दरिंदगी उनके हाँथ पाँव ठन्डे कर देती है.कभी निर्भया,कभी मोहनलालगंज केस तो कभी गौरी.इन सभी घटनाओं ने जहाँ पुरे देश और समाज को झन्झोर कर रख दिया.तो वही हम लड़कियों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया की आखिर मैंने जन्म ही क्यूँ लिया.उसके ज़हेन में कई सवाल चलते होंगे की क्या मैंने माँ की कोख से जन्म नहीं लिया,क्या मैं इंसान नहीं हूँ,क्यूँ जनम लेने के बाद भी मुझे कोई आज़ादी नहीं है.सिर्फ इसलिए क्यूंकि मेरे साथ एक लड़की होने का टैग लगा है?लड़की होने की इतनी बड़ी सजा है?जो आय दिन समाज में कोई भी राह चलते हम पर तेज़ाब फेक कर हमारी पहचान चीन लेता है.तो कोई भी पेट में रॉड डाल कर हमारे साँसे चीन लेता है.इन सबसे भी लोगो का मन नहीं भरा.तो जीते जी कसाइयों की तरह हमारे टुकड़े कर हमे ऐसी प्रताड़ना दे दी है जिसने हमारे कुछ भी सोचने,समझने और करने की छमता को ही ख़त्म कर देता है.क्या अब भी हमारी सरकार इन घटनाओं को “आपसी विवाद कहेगी”.पिछले साल १७ जुलाई को मोहनलालगंज केस में कई दिनों तक कोर्ट में ट्रायल शुरू नहीं हो पाया .इन सब के बाद हमारी सरकार कहती है “बेटी बचाओ,बेटी पढाओ”.अरे जब ऐसी दरिंदगी से बेटियाँ बचेंगी ही नहीं तो हम पढाएंगे किसे?सबसे पहले तो सरकार को कानून व्यवस्था में बदलाव करने चाहिए क्यूंकि जब बेबस माँ-बाप अपनी लापता लड़की की रिपोर्ट दर्ज कराने जाते है तो पुलिस प्रशासन उन्हें यह कह कर टरका देती है की वह अपनी मन मर्जी से कही चली गयी है.यही नहीं अगर लड़की छोटे कपडे पहने होती है या लड़कों से बात करती है तो भी लोग लड़की को ही गलत समझते है साथ ही साथ पुलिस प्रशाशन की ऊँगली भी सबसे पहले लड़की पर ही उठती है और कई तरह के सवालों की छड़ी लग जाती  है लेकिन ऐसे ही कुछ सवाल हम करे तो?की लडको को लड़कियों का रपे करने का,उन पर तेज़ाब फेकने का,उनके टुकड़े करने का,उन्हें इतनी बेरहमी से मारने का हक किसने दिया.हम लड़कियों के छोटे कपडे पहेने से और लडको से बात करने पर कई सवाल खड़े हो जाते है जब की यह सब करने के लिए हम स्वतंत्र है.पर लडको को ऐसी दरिंदगी करने के लिए तो कोई स्वतंत्रता नहीं है फिर क्यूँ आय दिन ऐसा होता आ रहा है.क्या है कोई जवाब हमारी सरकार के पास?.....          

Monday, 25 August 2014

                                         कुछ एहसास आँखों के नाम 

      

कभी  आइयने में तुम्हे निहारते हुए ,
तो कभी मन ही मन मुस्कुरा, तुम्हारी चमक बढ़ाते हुए.

कभी तुम्हे काजल से सजाते हुए ,
तो कभी गुस्से में उसे पोछते हुए .

कभी शरमाहट से पलके झुकाते हुए ,
तो कभी डर  से तुम्हे हाथों से छुपाते हुए .

कभी रात में तारों की चादर के तले उन्हें ताकते हुए,
तो कभी धुप में चश्मे से तुम्हे बचाते हुए.

कभी अनजान नज़रों से टकराते हुए,
तो कभी बुरी नज़रों को नज़रंदाज़ करते हुए.

कभी पानी  की छीटों से तुम्हारी थकान उतारते हुए,
तो कभी किसी जीत में ख़ुशी के आंसुओं को संभालते हुए.

कभी माधुरी की तरह नज़ाकत भरी अदाएं दर्शाते हुए,
तो कभी आत्मविश्वास के साथ अच्छी बुरी नजरो का सामना करते हुए.

है तो जज़्बात बताने को बेहिसाब ,
पर रहने दो उन्हें दिल के किसी कोने में एक अनछुए एहसास के साथ.  

Sunday, 24 August 2014

हैवानियत  ने फिर से दी दस्तक ,खोला नए निर्भया का चैप्टर 

दर्द ,पीड़ा ,चोट,तख़लीफ़ ये सारे शब्द सिर्फ शब्द  नहीं बल्कि किसी की ज़िन्दगी के  उस  भयानक दिन और मनहूस रात का  बखान करते है .जो  उस  वक़्त उस  लाचार  औरत  या फिर कहले  की एक  और  निर्भय के  दर्द  को चीख चीख कर पूरी दुनिया को दरिंदगी का  एक और भयानक पन्ना पढ़ने को  दे  रही थी .बेबस ,लाचर तो  वो  पहले  से  ही  थी  पति  न  होना उसकी  बाँहों  के  तले खुद  को  मेह्फूस  समझना ,उसके  साथ  को  एक  सुरख्षा  कवच  मानना  शायद  ज़्यादा  इन  तक  नहीं  रहा.पर क्या गलती थी  उसकी  की  वो अकेले  बिना  पति  के वो  अपने दो  बच्चों  की  अच्छे  से  देख  भाल  कर  रही  थी .या  फिर  वो एक औरत थी.सदियों  से  हमारे देश  में  और  प्रथाओं में  औरत  तो  मानो  एक  खिलौना  बन  कर  रह  गई.जिससे  जब  चाहे  लोग  खेल  ले  और  मन  भरने  पर  एक  कूड़ा  समझ  कर  गटर  में  फेक  देते  है .हमारे  यहाँ  तो  खिलौना  भी  कई  तरह  से  खेल  जाता  है .कभी  सती  तो कभी  द्रुपति इंसान  ने  हर  रूप  में  औरत  को  खेल  है  तो  अब निर्भया  के  रूप  में .निर्भया  जैसे भयानक  और  दर्दनाक  घटना  ने  पुरे  देश  को  जहाँ  एक ओर शर्म की अंधी में धूल से गन्दा होने के लिए मजबूर कर दिया था.तो वही उसकी चीखों हमें दर की आग में झुलसा कर रख दिया था.इस घटना ने पुरे देश को एक जुट हो कर इन्साफ की देहलीज़ पर कदम रख न्याय माँगा,नारे बाज़ी की,मोमबत्ती जल कर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की और इससे कही ज़्यादा पुलिस की लाठीयों का शिकार भी हुए.क्यों ?यह सवाल सबके मन में था क्यों उनकी आवाज़ों को लाठी के सहारे बंद किया जा रहा था .क्यों कोई कड़ा फैसला जल्दी  उन दरिंदों के खिलाफ नहीं लिया जा रहा था .लेकिन  लोगों की इस इन्साफ की लड़ाई ने न्याये करने पर आखिरकार मजबूर कर ही दिया और निर्भया को इन्साफ मिला.पर क्या ये इन्साफ काफी था?देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए देश की हालत  देखकर हम तो यही कहेंगे "नहीं" जहाँ निर्भया घटना के बाद प्रदेश में औरतो और लड़कियों पर होने वाले जुर्म कम हो जाने चाहिए तो वहीँ एक निर्भया को हम नही बचा पाये पर दूसरी तीसरी निर्भयाओं ने जन्म क्यों ले लिया? क्यों प्रदेश में ,राज्य में आज भी औरते और लड़कियां रात में क्या दिन में भी खुद को मेहफ़ूज़ नही समझती. उनका हर एक कदम घर के बाहर एक डर के साथ आगे बढ़ता है और एक डर के साथ ख़त्म होता है . कब तक महिलाएं इस डर के साथ जीती रहेंगी की दिल्ली की निर्भया के बाद वह प्रदेश की कहीं दूसरी चौथी निर्भया ना बन जाए. क्या है प्रशासन  के पास इसका कोई जवाब शायद "नही" और उनसे  हम उम्मीद  भी क्या कर सकते है भ्रष्टाचारर ने उनके मुह और हाँथ पैरों पर तले जो लगा  रखें  है. प्रशासन को शायद निर्भया की उन् चीखो में उमड़े दर्द का एहसास नही है जो उस वक्त उसने महसूस किया होगा, उन दरिंदों के भयानक चेहरे जो उस वक्त निर्भया को अपनी दरिंदगी से पीड़ा पहुंचा रहे थे. इन सबको इन सभी बातों का कोई एहसास नही है क्यूंकि आज तक इस तरह की घटना की शिकार उनकी माँ, बेटी और पत्नी नही हुई तभी शायद वह इस दर्द से परे है लेकिन सवाल यहाँ भी  खड़ा होता है की क्या ऐसी तमाम घटना जिसमे छोटी बच्चियां इनका शिकार बनती है क्या इन सब से भी इन्हे कोई फर्क नही पड़ता, क्या उनके मासूम  चेहरे भी नही दिखायी देते. नही दिखाई देते होंगे तभी आज ये हालत है की प्रदेश में निर्भया पर निर्भया जन्म लेती जा रहीं है और हम कुछ नही कर पा रहे. लगता है की ऐसी हैवानियत को अंजाम देने वाले दरिंदों को पुलिस प्रशासन और क़ानून को नही बल्कि जनता को सौंप देना चाहिए. जिससे उन दरिंदो को पता चले की महिला सिर्फ जुर्म सहने के लिए नही बल्कि उससे ख़त्म करने के लिए भी  पैदा हुई है. साथ ही साथ प्रशासन को भी एहसास हो की ऐसे दरिंदों को उम्र कैद या फ़ासी नही बल्कि ऐसी सजा होनी चाहिए  जिससे वह खुद मरने की भीक मांगे खुद भी वो तड़प , दर्द , घुटन महसूस करें जो उस वक्त उस निर्भया ने की होगी. ताकि ऐसे दुबारा करने से पहले दरिंदे सौ बार सोचने पर मजबूर हो जाये.

"औरत हूँ खिलौना नही 
बेबस हूँ पर कमज़ोर नही 
ऐ हैवानियत के दरिंदों अगर ले लूँ 
काली, दुर्गा का रूप तो तुम जैसे राक्षसों का नामों निशाँ नही "

Saturday, 23 August 2014

हर बैनर कुछ कहता है,
कभी छोटा तो कभी बड़ा होता है.

कभी मेंन रोड पर खड़ा मुस्कुराते हुए,
तो कभी रोड के किनारे धूल खाते हुए.

कभी सीधे साफ़ शब्दों में''दो बून्द ज़िन्दगी की'' कहता,
तो कभी एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा' की क्रिएटिविटी सिखाता.

कभी 1090 से सुरक्षित होने का एहसास कराता,
तो कभी''इनक्रेडिबल इंडिया''का खिताब दे जाता.

कभी ''दबंग से किक बनकर माउथ फ्रेश्नर'' बन जाता,
तो कभी''मोर देन टेबलेट एंड स्मार्टर देन फ़ोन एचपी'',स्मार्ट होने का एक और नया बहाना बन जाता.

कभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज का रास्ता सामने से दिखाता,
तो कभी ''व्हाई शुड बॉयज हैव ऑल द फन'' का मंत्र सिखाता.

नया बैनर आता है, तो पुराना चला जाता है,
पर अपने होने का मैसेज सबको दिखा जाता है.

तभी तो ''हर बैनर कुछ न कुछ कह'' जाता है.