नज़रिया
हालही में रिलीज़ हुई मूवी "बेग़म जान" देखी और हर महिला उन्मुख मूवी की तरह इस मूवी को देखकर भी नारी सशक्तिकरण वाली भावना जाग उठी। कुछ द्रश्यों में तो रौंगटे भी खड़े हो गए। लेकिन इस मूवी का असर सिर्फ तीन घण्टे तक ही नहीं रहा , बल्कि हमारी "बेग़म जान" ने हमे समाज के कई पहलुओं पर खास कर वेश्याओं के लिए सोचने पर मजबूर ही नहीं, कुछ लिखने के लिए, कुछ अच्छा सोचने के लिए प्रेरित भी किया।
अब आप सोच रहे होंगे की वेश्याओं के लिए क्या अच्छा हो सकता है। शायद इस बात को सुनकर कुछ लोग तो "HAWW (हॉव )" कर रहे होंगे , क्यूंकि " HAWW 😮और AWW😊 " आजकल ट्रेंड में जो है। तो मैं उन सभी ट्रेंड फॉलोवर्स को कहना चाहती हूँ , कि एक बार पधारिये हमारे "बावरों की पाठशाला" में सारा "HAWW 😮😮 और AWW 😊 😊 " निकल जायेगा। सच मनो तो आज बहुत अच्छा लग रहा है इस पाठशाला का हिस्सा बनकर। तभी तो "बेग़म जान ", आज "जान " सी लग रही है। पाठशाला में लेक्चर्स के दौरान कुछ बातें तभी से मन में घर कर गयी, कि वेश्या , कुलटा , तवायफ इन सब को देखकर हम लोग ऐसे मुँह बनाते है जैसे सड़क पर पड़े कोड़े को देखकर। लेकिन शायद हम ये भूल जाते है कि यही कूड़ा लोगो की रात को और हसीन बनाने वाला लायक सामान बन जाता है। वैसे भी किसी ने सही कहा है , कि वेश्याओं के लिए क्या दिन और क्या रात दोनों एक जैसे होते है, "बस बत्ती बुझने की देरी होती है।"
मूवी के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे मंदबुधियों से हुई की मन किया , तुम लोग जिन्हे देखकर सिटी मार रहे हो, कमेंट पास कर रहे हो , वो तुम मूर्खों से कही ज़्यादा दबंग , बोल्ड और निडर है। अगर मेरे बस में होता तो तुम लोगो के हाँथ और मुँह का वो क्या कहते है "PARTITION" करवा देंगे। लेकिन फिर सोचा कि कुछ लोगो के लिए मूवी सिर्फ एक " एंटरटेनमेंट " ही है। शायद लोगो ने विद्या बालन जी का "डर्टी पिक्चर"का ये डायलॉग "फिल्मे सिर्फ ३ चीज़ो से चलती है एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट एंड एंटरटेनमेंट" को काफी संजीदगी से ले लिया है। तभी तो उन्हें "बेग़म जान" में सिर्फ "हवस के पुजारी" ही नज़र आये। लेकिन मूवी में गुलाबो ,रुबीना ,शबनम ,लाडली का क्या किरदार था ,वो उनकी बेफिज़ूल सीटियों , तालियों और भद्दे कमैंट्स से समझ आ रहा था।
शायद इन्हे गुलाबो का मास्टरजी के लिए वो प्रेम नज़र नहीं आया जो वो अपने धंदे को अलग रखकर उनके लिए हर गुरुवार व्रत रखती और उन्हें देखकर अपना व्रत तोड़ती , शायद इन्हे शबनम का वो दर्द वो ख़ामोशी महसूस नहीं हुई , जो सन्नाटे को मात दे रही थी, यहाँ तक की इन्हे तो लाडली की वो हिम्मत वो हौसला भी नज़र नहीं आया, जब अपनी माँ और अपने आप को बचाने के लिए खुद निर्वस्त्र होकर सामने वाले को शर्मसार कर दिया।
इन सबके पीछे का दर्द , इनकी सहनशीलता और भावनाये क्या है , हम नहीं समझ सकते। इतनी गालियां, आलोचनाएं सुनने के बाद और अपनी इच्छाओं को मारकर , अपने काम को इतनी ईमानदारी के साथ करना कोई इनसे सीखे। सालो की मेहनत के बाद ये कलाकर हमे ३ घण्टे में समाज के अलग अलग पहलुओं से रूबरू कराते है। चाहे पुराने ज़माने में होने वाली " जौहर प्रथा " हो या फिर हर महीने हमे लाल करके जाती "मासिक अवधि।" इन दोनों बातों से और ऐसी तमाम बातों से महिलाओं में सहनशीलता, धैर्य, ताकत और ईमानदारी साफ़ झलकती है। लेकिन आज भी महिलायें समाज और इसकी रूढ़िवादी बातों के बीच पिस रही है। शायद आगे भी पिसती आएंगी। इसीलिए कहा गया है।
चलती चाखि देख कर
दिया कबीरा रोये ,
दो पाटन के बीच में, सबूत बचा न कोई.....

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