Saturday, 21 February 2015

बस शिकायत है मुझे

जहाँ बूढ़े माँ-बाप को औलाद से शिकायत है,जनता को सरकार से शिकायत है,सेंसर बोर्ड को फिल्मो में अश्लीलता से शिकायत है,गर्लफ्रेंड को बॉयफ्रेंड से शिकायत है,प्रक्रति को मनुष्य से शिकायत है| तो वहीँ एक मैं भी हूँ जिसे दूसरों से नहीं खुद से शिकायत है| शायद जो करना चाहती हूँ,वो कर नहीं पाती हूँ,जो समझाना चाहती हूँ,वो समझा नहीं पाती हूँ| सब जानते हुए भी चुप रह जाती हूँ| काश जो हुआ था वो बता देती तो आज खुद से शिकायत न होती| लेकिन क्या बताती माँ-पापा को कि कैसे उन गंदे हांथों ने आपकी छोटी सी बेटी को बड़ा बना दिया|कैसे उसकी गंदी और डरावनी नज़रों ने मुझे सहमा दिया| कैसे उसकी अश्लील बातों ने मुझे खुद से ही घिन करवा दी| कैसे बताती कि जिसने मुझे खिलने से पहेले ही मुरझाने पर मजबूर कर दिया,वो कोई अपना ही है|दर था कि कहीं ये बताने पर माँ-पापा ने मुझे ही गलत समझा तो|यही सोचते-सहमते बचपन बीत गया|बड़ी तो पहले ही हो चुकी थी बस फर्क इतना था,कि पहले लोगो को दीखता नहीं था पर अब दिखने लगा है| बड़े होने के साथ-साथ मेरी शिकायत बढती गयी| मुझे पता है कि मेरे अधिकार क्या है, मैं स्वतंत्र हूँ कुछ भी कहने के लिए,गलत होने से रोकने के लिए,पर ये सब जानते हुए भी आज तक कुछ नहीं बोल पाई| सब जानते हुए भी चुप रही इससे शिकायत है मुझे| अपनी नज़रों के सामने उस इंसान को हँसते और कुछ न कर पाने से शिकायत है मुझे| डरपोक और कमजोर होने से शिकायत है मुझे| गुस्सा होने के बावजूद उसे ज़ाहिर न कर पाने से शिकायत है मुझे|मेरे दर और चुप्पी के कारण ये किसी और कि शिकायत न बन जाये,इससेभी शिकायत है मुझे| थक गयी हूँ इन शिकायतों से अपने ही दर और सोच से, “ खत्म करना चाहती हूँ इस डर को, तोड़ना चाहती हूँ इस चुप्पी को, इंतज़ार है बस मुझे उस लम्हे का दूंगी जब मूंहतोड़ जवाब उस दरिन्दे को”.

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